......और मैंने शेर भगा दिए

पत्रकारिता की विश्वसनीयता को लेकर जब लिख रहा था तब, लिखते-लिखते ही मुझे मेरी एक दुस्साहसभरी मूर्खता याद आ रही थी। मेरी यह मूर्खता, पत्रकारिता की विश्वसीनयता से सीधे-सीधे शायद न जुड़ती हो लेकिन मुझे यह अन्ततः जुड़ती हुई ही लगती है। 

यह 1973-74 की बात है। मैं मन्दसौर में एक दैनिक का सम्पादक था। तब, जिला स्तर के अखबार टेªडल पर छपते थे और आकाशवाणी के रात पौने नौ बजेवाले समाचार बुलेटिन के बाद अन्तिम स्वरूप ले लेते थे। तब, लेण्ड लाइन टेलिफोन ही सम्पर्क का एकमात्र साधन होता था। अपने शहर/कस्बे से बाहर बात करने के लिए ट्रंक कॉल बुक करने पड़ते थे। तब, एसटीडी सेवाएँ भी नहीं थीं।

वह तेज बरसात की रात थी। शिवना में बाढ़ आई हुई थी। आधा से अधिक मन्दसौर बाढ़ के पानी से लबालब था। निचली बस्तियाँ पानी में डूबी हुई थीं और मुख्य बाजार की मुख्य सड़कें नहरें बनी हुई थीं। उन दिनों शिवना की बाढ़ वार्षिक प्रतीक्षित घटना हुआ करती थी। लोग त्रस्त भी रहते थे और दुःख का आनन्द भी लिया करते थे। शहर की मुख्य बाजार की मुख्य सड़क, कालिदास मार्ग पर एक वर्ष मैंने भी नौका विहार किया था। जिला प्रशासन को पहले से ही मालूम रहता था कि कहाँ-कहाँ, क्या-क्या हो सकता है। उसकी तैयारी पूरी रहती थी। इसी के चलते बाढ़ से निपटने के इन्तजामों को लेकर हम अखबारवालों को जिला प्रशासन की आलोचना करने के मौके बहुत ही कम मिल पाते थे।

उस वर्ष, बरसात के उस मौसम में मन्दसौर में एक सर्कस आया हुआ था। बाढ़ ने उसके डेरे-तम्बू उखाड़ दिए थे। सर्कस में तीन या चार शेर भी थे। बाढ़ के कारण उन शेरों के भाग जाने की चर्चा पूरे मन्दसौर में फैली हुई थी। बरसात से हमारा फोन बन्द पड़ा था। नयापुरा स्थित हमारा दफ्तर बाढ़ से तनिक भी प्रभावित नहीं था किन्तु हम पूरी दुनिया से कटे हुए थे। ‘लेटेस्ट’ समाचार जानने के लिए लोग आ-जा रहे थे। मैं उनसे शेरों की खबर की ही पूछताछ कर रहा था। किसी के पास पक्की खबर नहीं थी लेकिन अपना अनुमान जताने में कोई भी देर नहीं कर रहा था। लगभग प्रत्येक कहता - ‘एँ! ये भी कोई पूछने की बात है? वो तो कभी के भाग गए होंगे।’ 

उन दिनों मैं मन्दसौर का युवतम पत्रकार का तमगा हासिल किए था। उत्साह से लबालब। हमारा अखबार नया-नया था। मैं पहली बार सम्पादन कर रहा था किन्तु इन्दौर-भोपाल के अनेक पत्रकारों से मेरा सम्पर्क हो चुका था। उनका काम करने का तरीका मैं देख चुका था। इसका मुझे अतिरिक्त लाभ मिला था। मेरे सम्वाददाताओं में मेरे प्रति अतिरिक्त विश्वास, मालिक से मिली छूट और मेरी थोड़ी-बहुत मेहनत के कारण हमारे अखबार ने लोगों के बीच हमारी उम्मीदों से अधिक विश्वसनीयता हासिल कर ली थी। हमें गर्मजोशी से हाथोंहाथ लिया जा रहा था।  ये सारी बातें मुझे, अपने प्रतियोगी अखबारों को पछाड़ने की उद्दाम भावना के अधीन लोगों के अनुमान को अन्तिम सच मानने को उकसाए जा रही थी। पत्रकारिता (और बाद में बीमा में भी) मेरे गुरु (अब स्वर्गीय) श्री हेमेन्द्र त्यागी मेरे दफ्तर में ही बैठे थे। उन दिनों वे ‘नव-भारत’ का काम देख रहे थे। साहित्य, इतिहास और पुरातत्व में उनका बड़ा दखल था। वे जानकारियों और सन्दर्भों के भण्डार थे। मन्दसौर ही नहीं, पूरे जिले में उनका बड़ा दबदबा था। वे ‘घुमा कर’ बात करते थे। पत्रकारवार्ताओं में उनके सवाल सामनेवाले पर धोबी पछाड़ जैसा असर करते थे। वे मुझ पर बराबर नजर गड़ाए हुए थे। सर्कस के शेरों को लेकर जैसे ही कोई आगन्तुक अपना अनुमान जताता, बुलेट की तरह त्यागीजी का सवाल आता - ‘अन्दाज से कह रहे हो या तुमने भागे हुए शेरों को देखा या सर्कस के मालिक से बात की है?’ जवाब देनेवाले की मानो घिघ्घी बँध जाती। घुटी-घुटी आवाज आती - ‘अन्दाज से कहा।’ त्यागीजी कहते तो कुछ नहीं लेकिन जिन नजरों से सामनेवाले को देखते, वह उनकी ताब नहीं झेल पाता। वह जल्दी से जल्दी जाने की जुगत भिड़ाने लगता।

रात के नौ बज चुके थे। शेरों के भाग जाने की प्रतीक्षामय अपेक्षा में मैंने पहला पेज रोक रखा था। कम्पोजिटर चाह कर भी नहीं जा पा रहे थे। उनकी पूरी बस्ती पानी में डूबी हुई थी। उन्हें सुबह तक प्रेस में ही रुकना था। सवा नौ बजते-बजते मेरा धीरज उबलने लगा। अचानक ही एक सन्देशवाहक आया। वह त्यागीजी के लिए सन्देश लेकर आया था। उन्हें तत्काल ही घर के लिए रवाना होना पड़ा। लेकिन जाने से पहले, किसी कड़क थानेदार की तरह मुझे हिदायत दे गए - ‘मैं जानता हूँ, तू शेरों को भगाने के लिए उतावला बैठा है। तेरे पास काई अधिकृत खबर नहीं है। पीआरओ या कलेक्टर या एसपी से तेरी बात नहीं हुई है। आनेवाले सबसे मैंने तेरे सामने ही पूछा है। एक ने भी ने भी शेरों के भागने की खातरी नहीं की है। मैं जा रहा हूँ। तू शेर भगा मत देना। बहुत ही नाजुक मामला है। जिला प्रशासन पहले से ही परेशान है। शेरों के भागने की खबर से लोगों में दहशत फैलेगी और भगदड़ मच सकती है। किसी भी कीमत पर शेरों का भगाना मत।’

और त्यागीजी चले गए। उनकी हिदायत मुझे बिलकुल ही अच्छी नहीं लगी। मेरा मन उसे मानने को तैयार ही नहीं था। साढ़े नौ बजते-बजते मुख्य कम्पोजीटर रमेश बोला - ‘बैरागीजी! हमें तो रात भर यहीं रहना है। लेकिन बाकी लोगों को तो घर जाना है! अखबार कब छपेगा और कब बाहर जाएगा? जो भी करना हो, करो।’ दफ्तर में अब मैं ही मैं था। मालिक तो वैसे भी नहीं रहते थे। जो भी थे, मेरा कहा माननेवाले ही थे। उत्साह के अतिरेक मैंने जोखिम लेने का फैसला किया। शेरों के भागने का समाचार लिखा और रमेश को थमाया। रमेश ने अविश्वास और हैरतभरी नजरों से मुझे देखा और निराशाजनक स्वरों में बोला - ‘तो अपन शेर भगा रहे हैं?’ मैंने अनुभवी पत्रकार और सम्पादकीय रुतबे से कहा - ‘हाँ। अपन ने भगा दिए। अपन ने क्या भगा दिए, वे सच्ची में भाग गए।’

अखबार छपा। यूँ तो मैं देर से उठता हूँ किन्तु उस दिन जल्दी उठ गया। बाढ़ का पानी लगभग रात जैसा ही बना हुआ था। सरकारी मदद से कोतवाली पहुँचा। मैं गर्वोन्मत्त, इतराया हुआ था। लेकिन कोतवाली पहुँचते ही वहाँ मौजूद तमाम सरकारी अधिकारी मुझ पर टूट पड़े। पिटाई के अलावा बाकी सब मेरे साथ हुआ। मैं वहाँ से भाग जाना चाहता था लेकिन चारों ओर पानी ही पानी। जाने के लिए सरकारी मदद चाहिए और सारे के सारे मुझसे नाराज। बिना चाय-पानी, ग्यारह बज गए। त्यागीजी भी वहाँ पहुँच गए। मुझे देखते ही उनकी आँखों से मानो लपटें उठने लगी। मैंने प्रणाम किया तो मेरे दोनों हाथ झटक कर अन्दर चले गए। उसके बाद कोई सप्ताह भर तक मुझसे बात ही नहीं की। वह समय मेरे लिए अत्यधिक पीड़ादायक रहा। लेकिन कहता भी तो किससे कहता और क्या कहता?

मेरी खूब जग-हँसाई हुई। जो प्रतियोगी पत्रकार मेरा लिहाज पालते थे, सबको ख्ुालकर खेलने का मौका मिल गया। मेरी दशा यह कि घर में रुक नहीं सकता और बाहर कहीं बैठने की हिम्मत ही न हो। कोई एक पखवाड़े बाद त्यागीजी ने मेरी ओर देखा। मेरी पीठ पर खूब घूँसे मारे। उसके बाद दिन में जब भी पहली बार मिलते या फोन पर बात होती तो पहला सवाल करते - ‘आज कितने शेर भगाए?’ जवाब में मुझे रोना-रोना आ जाता।

तब संचार साधन बहुत सीमित थे। इसलिए, हमारे अखबार के पाठकीय क्षेत्र के बाहर बात बहुत ही धीरे-धीरे लोगों तक पहुँची। मेरी तकदीर अच्छी रही कि पुरानी हो जाने के कारण कहीं भी ज्यादा देर नहीं टिकी। 

किन्तु आदमी अपनी मूर्खताएँ कभी नहीं भूलता। भूल ही नहीं सकता। उसे डर लगा रहता है - कोई पुराना जानकार उस मूर्खता को उजागर न कर दे। और वैसा होता ही होता है। आज भी, जब उन दिनों के साथी-संगाती मिल जाते हैं तो कोई न कोई तो मजे ले ही लेता है - ‘अच्छा हुआ रे! जो तूने पत्रकारिता छोड़ दी। वर्ना जाने कहाँ-कहाँ जाने कितने शेर भगाता रहता।’  

समझदार लोग अपनी मूर्खताओं से अकल लेते हैं। अधिक समझदार वे होते हैं जो दूसरे की मूर्खता से अकल लेते हैं। आपके लिए यह बहुत ही बढ़िया मौका है।
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