........और इस तरह उल्टा लटका दिया कलेक्टरों को

(मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान की, कलेक्टरों को उल्टा लटकाने की चेतावनी को कलेक्टरों ने किस तरह चुटकुला माना था, इसका जिक्र मैंने अपनी इस पोस्ट में किया था। कलेक्टरों का सोचना कितना सच था, यह चेतावनी दिए जाने के एक पखवाड़े से भी कम समय में, इस पन्द्रह अगस्त को ही साबित हो गया।  लोकतन्त्र में ‘लोक’ और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा, अवहेलना मुझे सदैव ही उद्वेलित करती है। ‘लोक’ और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों पर ‘तन्त्र’ का ‘नियन्त्रक’ की सीमा तक हावी हो जाना मुझे ‘लोकतन्त्र की हत्या’ लगता है। अपनी ये भावनाएँ प्रकट करने का कोई मौका मैं कभी नहीं छोड़ता। इस मामले में ‘बड़े’ अखबारों की चुप्पी मुझे सदैव ही हतप्रभ करती है। वैसे भी मेरी यह धारणा दिन-प्रति-दिन पुष्ट होती जा रही है कि ‘गोदी मीडिया’ बन चुके बड़े अखबारों के मुकाबले जिला, तहसील स्तर पर निकल रहे ‘छोटे अखबार’ अनायास ही ‘बड़ी खबरें’ छाप देते हैं। ‘छोटे अखबार में बड़ी खबर’ का ऐसा ही एक उदाहरण मुझे अभी-अभी, सत्रह अगस्त को देखने को मिला। रतलाम से प्रकाशित हो रहे ‘साप्ताहिक उपग्रह’ के स्वाधीनता दिवस विशेषांक के अन्तिम पन्ने पर प्रकाशित समाचार मुझे मेरी भावनाओं और मिजाज के अनुकूल पाया। अखबार को तो बधाई दी ही, सम्वाददाता का नाम पूछकर उसे भी बधाई दी। यहाँ, प्रकाशित समाचार की स्केन प्रति तो दे ही रहा हूँ, अच्छी बात, अच्छे काम और अच्छे आदमी की सराहना करने की भावना के अधीन, सम्वाददाता अरुण त्रिपाठी (मोबाइल नम्‍बर 94253 65004) का चित्र भी दे रहा हूँ। सुविधा मिल जाने के कारण वाक्य रचना और वैयाकरणिक चूकों को सुधारने की यथा समझ कोशिश कर ली है।) 

मध्य प्रदेश में जनप्रतिनिधियों पर भारी पड़े नौकरशाह

रतलाम। प्रदेश में वैसे तो आए दिन नौकरशाही हावी होने के मामले सामने आते रहते हैं, लेकिन इस बार तो आजादी का पर्व उसी का शिकार हो गया। प्रोटोकाल याने सरकारी कार्य व्यवहार-समुचित प्रक्रिया का मखौल उड़ाते हुए सरकारी तन्त्र ने जिला स्तर के स्वाधीनता दिवस के मुख्य कार्यक्रमों में कलेक्टरों से तिरंगा फहरवाया, जबकि अधिकांश जिलों में प्रोटोकाल के मुताबिक कई जनप्रतिनिधि उपलब्ध थे। राजनीतिक दृष्टि से भी सरकार को कोई परेशानी नहीं थी क्योंकि पिछले डेढ़-दो साल से वह जनप्रतिनिधियों को सम्मान दे रही थी। चुनावी साल से ठीक पहले नौकरशाहों की इस करतूत के कई मायने निकाले जा रहे हैं। 

आधिकारिक जानकारी के अनुसार इस बार स्वतन्त्रता दिवस पर प्रदेश के 21 जिलों में कलेक्टरों ने तिरंगा फहराया। इन जिलों में धार, खरगोन, झाबुआ, रतलाम, शाजापुर, मन्दसौर, नीमच, गुना, अशोक नगर, श्योपुर, सिंगरौली, अनूपपुर, टीकमगढ़, हरदा, बैतूल, नरसिंहपुर, बालाघाट, डिण्डोरी, मण्डला, अलीराजपुर, शहडोल जिले शामिल हैं। विडम्बना है कि इनमें से अधिकांश जिलों में पिछले गणतन्त्र दिवस और स्वतन्त्रता दिवस पर जिला पंचायत अध्यक्षों अथवा प्रभारी मन्त्रियों ने झण्डावन्दन किया था। इस बार भी शासन ने प्रभारी मन्त्रियों के कार्यक्रमों में भी फेरबदल किया गया। पहले उन्हें उनके प्रभार वाले जिलों में भेजा जाना तय हुआ, फिर गृह जिलों में तिरंगा फहराने का तोहफा दे दिया गया। आश्चर्य इस बात का है कि जिन जिलों में कलेक्टरों ने झण्डावन्दन किया, उनमें से अधिकांश में प्रोटोकाल के वरीयता क्रम अनुसार कलेक्टर से कई ऊँची वरीयता रखने वाले जनप्रतिनिधि मौजूद थे। राजनीतिक कारणों से यदि विधायकों और सांसदों को मौका नहीं दिया जा सकता था तो मन्त्री का दर्जा प्राप्त जनप्रतिनिधियों को मौका देकर इस स्थिति को सम्हाल सकता था। लेकिन भोपाल में बैठे नौकरशाहों ने  प्रोटोकाल को ताक में रखकर जनप्रतिनिधियों को सम्मान देने के बजाय जिलों में पदस्थ अफसरों को परेड की सलामी दिलवा दी। 
यह है प्रोटोकाल-क्रम
मध्य प्रदेश राजपत्र के 23 दिसम्बर 2011 के प्रकाशन में सामान्य प्रशासन विभाग ने पूर्व की सभी अधिसूचनाओं को शामिल करते हुए विशिष्ट व्यक्तियों की श्रेणी और पद के सम्बन्ध में पूर्वता क्रम दर्शाने वाली सूची प्रकाशित की है। इसके मुताबिक सूची में कलेक्टर का स्थान 34 वाँ है जबकि सांसद, विधायक, महापौर तथा राज्य मन्त्री के समकक्ष हैसियत रखने वाले निर्वाचित व्यक्ति को 24वाँ स्थान दिया गया है। भारत सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग द्वारा 19 नवम्बर 2014 को प्रशासन तथा सांसद-विधायकों के बीच सरकारी कार्य-व्यवहार-समुचित प्रक्रिया के पालन के सम्बन्ध में पत्र जारी किया गया है। इसमें देश के लोकतान्त्रिक ढाँचे में सांसदों और विधायकों का महत्वपूर्ण स्थान बताते हुए उन्हें सम्मान देने के सम्बन्ध में दिशा-निर्देश दिए गए है। इस पत्र में सभी प्रदेशों के मुख्य सचिवों को दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए पाबन्द किया गया है। इस लिहाज से कलेक्टर (जिसे स्वयम् जनप्रतिनिधियों का सम्मान सुनिश्चित करना है) यदि खुद ही मुख्य अतिथि बन गया, तो जनप्रतिनिधियों कौन  पूछेगा?

प्रोटोकॉल को चिढ़ाती रतलाम की बानगी
स्वाधीनता दिवस पर रतलाम का मुख्य समारोह पूरे प्रदेश की हकीकत बयाँ करने के लिए काफी है। इस समारोह में शासन के निर्देशानुसार कलेक्टर ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया। समारोह में महापौर, जिला पंचायत अध्यक्ष, राज्य वित्त आयोग अध्यक्ष और राज्य कृषक आयोग अध्यक्ष उपस्थित रहे। इससे पूर्व रतलाम में पिछले दो अवसरों पर जिला पंचायत अध्यक्ष और एक बार खुद मुख्यमन्त्री ने झण्डावन्दन किया है। प्रोटोकाल के अनुसार रतलाम में कलेक्टर से वरीयता क्रम से ऊँचा स्थान रखने वाले कई लोग हैं। महापौर, जिला पंचायत अध्यक्ष, राज्य वित्त आयोग अध्यक्ष और राज्य कृषक आयोग अध्यक्ष के अलावा राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष का पद भी रतलाम को मिला है, जो वरीयता क्रम में मुख्यमन्त्री के साथ 8वें नम्बर पर ही है। नौकरशाहों ने इन सभी को नजरअन्दाज कर दिया। आगामी साल में विधानसभा के चुनाव होना हैं। ऐसी स्थिति में जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के कई अर्थ निकाले जा रहे है। इस एक मुद्दे से यह भी जाहिर हो गया कि सरकार नौकरशाहों की लगाम कसने के कितने ही दावे करे, लेकिन असल में वह स्वाधीनता दिवस पर भी नौकरशाहों के ही अधीन थी। 
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चीनी सामान का बहिष्कार याने रुई लपेटी आग

देश में इन दिनों उग्र राष्ट्रवाद और कट्टर धर्मान्धता की अफीम का समन्दर ठाठें मार रहा है। भ्रष्टाचार और कालेधन का खात्मा न होना, बढ़ती बेरोजगारी, स्कूलों-कॉलेजों में दिन-प्रति-दिन कम होते जा रहे शिक्षक, घटती जा रही चिकित्सा सुविधाएँ, किसानों की बढ़ती आत्महत्याएँ जैसे मूल मुद्दे परे धकेल दिए गए हैं। असहमत लोगों को देशद्रोही घोेषित करना और विधर्मियों का खात्मा मानो जीवन लक्ष्य बन गया है।

लेकिन सब लोगों को थोड़ी देर के लिए मूर्ख बनाया जा सकता है। कुछ लोगों को पूरे समय मूर्ख बनाए रखा जा सकता है। किन्तु सब लोगों को पूरे समय मूर्ख नहीं बनाए रखा जा सकता। 

जून और जुलाई के पूरे दो महीने मैं फेस बुक से दूर रहा। गए कुछ दिनों से सरसरी तौर पर देखना शुरु किया। इसी क्रम में राजेश कुमार पाण्डेय की एक पोस्ट नजर आई। घटना सम्भवतः बस्ती (उत्तर प्रदेश) की है। यह पोस्ट मैंने भी साझा की। उसके तीन स्क्रीन शॉट यहाँ दे रहा हूँ। इनमें पूरी पोस्ट पढ़ी जा सकती है। सारी बात अपने आप में स्पष्ट है। अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती।



लोग समझ तो शुरु से रहे थे और समझ रहे हैं लेकिन बोल कोई नहीं रहा था। अब लोगों ने बोलना शुरु कर दिया है। लोग ही क्यों? बोलना तो भाजपा सांसदों ने भी शुरु कर दिया है। यह अलग बात है कि वे चुप रह कर बोल रहे हैं। संसद के सदनों में अपने सांसदों की अनुपस्थिति से खिन्न प्रधान मन्त्री मोदी दो-दो बार उन्हें चेतावनी दे चुके लेकिन अनुपस्थिति का क्रम बना रहा। स्थिति यहाँ तक आ गई कि मोदी को धमकी देनी पड़ी - ‘2019 में देख लूँगा।’

यह सब देख-देख कबीर का एक दोहा बरबस ही याद आ गया। कबीरदासजी से क्षमा याचना सहित, उसमें ‘पाप’ को विस्थापित कर, ‘साँच’ का उपयोग कर रहा हूँ -

साँच छुपाए ना छुपे, छुपे तो मोटा भाग।
दाबी-दूबी ना रहे, रुई लपेटी आग।।

सच सामने आ रहा है। सच हमेशा ताकत देता है। इसी का असर है कि सच लोगों की जबान और सर पर चढ़कर बोलने लगा है। 

सत्य तो सनातन से परीक्षित है। झूठ को ही खुद को साबित करना पड़ता है। परास्त तो अन्ततः झूठ को ही होना है। तब तक सत्य को छोटे-छोटे संकट झेलते रहने पड़ेंगे।
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