........और इस तरह उल्टा लटका दिया कलेक्टरों को

(मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान की, कलेक्टरों को उल्टा लटकाने की चेतावनी को कलेक्टरों ने किस तरह चुटकुला माना था, इसका जिक्र मैंने अपनी इस पोस्ट में किया था। कलेक्टरों का सोचना कितना सच था, यह चेतावनी दिए जाने के एक पखवाड़े से भी कम समय में, इस पन्द्रह अगस्त को ही साबित हो गया।  लोकतन्त्र में ‘लोक’ और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा, अवहेलना मुझे सदैव ही उद्वेलित करती है। ‘लोक’ और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों पर ‘तन्त्र’ का ‘नियन्त्रक’ की सीमा तक हावी हो जाना मुझे ‘लोकतन्त्र की हत्या’ लगता है। अपनी ये भावनाएँ प्रकट करने का कोई मौका मैं कभी नहीं छोड़ता। इस मामले में ‘बड़े’ अखबारों की चुप्पी मुझे सदैव ही हतप्रभ करती है। वैसे भी मेरी यह धारणा दिन-प्रति-दिन पुष्ट होती जा रही है कि ‘गोदी मीडिया’ बन चुके बड़े अखबारों के मुकाबले जिला, तहसील स्तर पर निकल रहे ‘छोटे अखबार’ अनायास ही ‘बड़ी खबरें’ छाप देते हैं। ‘छोटे अखबार में बड़ी खबर’ का ऐसा ही एक उदाहरण मुझे अभी-अभी, सत्रह अगस्त को देखने को मिला। रतलाम से प्रकाशित हो रहे ‘साप्ताहिक उपग्रह’ के स्वाधीनता दिवस विशेषांक के अन्तिम पन्ने पर प्रकाशित समाचार मुझे मेरी भावनाओं और मिजाज के अनुकूल पाया। अखबार को तो बधाई दी ही, सम्वाददाता का नाम पूछकर उसे भी बधाई दी। यहाँ, प्रकाशित समाचार की स्केन प्रति तो दे ही रहा हूँ, अच्छी बात, अच्छे काम और अच्छे आदमी की सराहना करने की भावना के अधीन, सम्वाददाता अरुण त्रिपाठी (मोबाइल नम्‍बर 94253 65004) का चित्र भी दे रहा हूँ। सुविधा मिल जाने के कारण वाक्य रचना और वैयाकरणिक चूकों को सुधारने की यथा समझ कोशिश कर ली है।) 

मध्य प्रदेश में जनप्रतिनिधियों पर भारी पड़े नौकरशाह

रतलाम। प्रदेश में वैसे तो आए दिन नौकरशाही हावी होने के मामले सामने आते रहते हैं, लेकिन इस बार तो आजादी का पर्व उसी का शिकार हो गया। प्रोटोकाल याने सरकारी कार्य व्यवहार-समुचित प्रक्रिया का मखौल उड़ाते हुए सरकारी तन्त्र ने जिला स्तर के स्वाधीनता दिवस के मुख्य कार्यक्रमों में कलेक्टरों से तिरंगा फहरवाया, जबकि अधिकांश जिलों में प्रोटोकाल के मुताबिक कई जनप्रतिनिधि उपलब्ध थे। राजनीतिक दृष्टि से भी सरकार को कोई परेशानी नहीं थी क्योंकि पिछले डेढ़-दो साल से वह जनप्रतिनिधियों को सम्मान दे रही थी। चुनावी साल से ठीक पहले नौकरशाहों की इस करतूत के कई मायने निकाले जा रहे हैं। 

आधिकारिक जानकारी के अनुसार इस बार स्वतन्त्रता दिवस पर प्रदेश के 21 जिलों में कलेक्टरों ने तिरंगा फहराया। इन जिलों में धार, खरगोन, झाबुआ, रतलाम, शाजापुर, मन्दसौर, नीमच, गुना, अशोक नगर, श्योपुर, सिंगरौली, अनूपपुर, टीकमगढ़, हरदा, बैतूल, नरसिंहपुर, बालाघाट, डिण्डोरी, मण्डला, अलीराजपुर, शहडोल जिले शामिल हैं। विडम्बना है कि इनमें से अधिकांश जिलों में पिछले गणतन्त्र दिवस और स्वतन्त्रता दिवस पर जिला पंचायत अध्यक्षों अथवा प्रभारी मन्त्रियों ने झण्डावन्दन किया था। इस बार भी शासन ने प्रभारी मन्त्रियों के कार्यक्रमों में भी फेरबदल किया गया। पहले उन्हें उनके प्रभार वाले जिलों में भेजा जाना तय हुआ, फिर गृह जिलों में तिरंगा फहराने का तोहफा दे दिया गया। आश्चर्य इस बात का है कि जिन जिलों में कलेक्टरों ने झण्डावन्दन किया, उनमें से अधिकांश में प्रोटोकाल के वरीयता क्रम अनुसार कलेक्टर से कई ऊँची वरीयता रखने वाले जनप्रतिनिधि मौजूद थे। राजनीतिक कारणों से यदि विधायकों और सांसदों को मौका नहीं दिया जा सकता था तो मन्त्री का दर्जा प्राप्त जनप्रतिनिधियों को मौका देकर इस स्थिति को सम्हाल सकता था। लेकिन भोपाल में बैठे नौकरशाहों ने  प्रोटोकाल को ताक में रखकर जनप्रतिनिधियों को सम्मान देने के बजाय जिलों में पदस्थ अफसरों को परेड की सलामी दिलवा दी। 
यह है प्रोटोकाल-क्रम
मध्य प्रदेश राजपत्र के 23 दिसम्बर 2011 के प्रकाशन में सामान्य प्रशासन विभाग ने पूर्व की सभी अधिसूचनाओं को शामिल करते हुए विशिष्ट व्यक्तियों की श्रेणी और पद के सम्बन्ध में पूर्वता क्रम दर्शाने वाली सूची प्रकाशित की है। इसके मुताबिक सूची में कलेक्टर का स्थान 34 वाँ है जबकि सांसद, विधायक, महापौर तथा राज्य मन्त्री के समकक्ष हैसियत रखने वाले निर्वाचित व्यक्ति को 24वाँ स्थान दिया गया है। भारत सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग द्वारा 19 नवम्बर 2014 को प्रशासन तथा सांसद-विधायकों के बीच सरकारी कार्य-व्यवहार-समुचित प्रक्रिया के पालन के सम्बन्ध में पत्र जारी किया गया है। इसमें देश के लोकतान्त्रिक ढाँचे में सांसदों और विधायकों का महत्वपूर्ण स्थान बताते हुए उन्हें सम्मान देने के सम्बन्ध में दिशा-निर्देश दिए गए है। इस पत्र में सभी प्रदेशों के मुख्य सचिवों को दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए पाबन्द किया गया है। इस लिहाज से कलेक्टर (जिसे स्वयम् जनप्रतिनिधियों का सम्मान सुनिश्चित करना है) यदि खुद ही मुख्य अतिथि बन गया, तो जनप्रतिनिधियों कौन  पूछेगा?

प्रोटोकॉल को चिढ़ाती रतलाम की बानगी
स्वाधीनता दिवस पर रतलाम का मुख्य समारोह पूरे प्रदेश की हकीकत बयाँ करने के लिए काफी है। इस समारोह में शासन के निर्देशानुसार कलेक्टर ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया। समारोह में महापौर, जिला पंचायत अध्यक्ष, राज्य वित्त आयोग अध्यक्ष और राज्य कृषक आयोग अध्यक्ष उपस्थित रहे। इससे पूर्व रतलाम में पिछले दो अवसरों पर जिला पंचायत अध्यक्ष और एक बार खुद मुख्यमन्त्री ने झण्डावन्दन किया है। प्रोटोकाल के अनुसार रतलाम में कलेक्टर से वरीयता क्रम से ऊँचा स्थान रखने वाले कई लोग हैं। महापौर, जिला पंचायत अध्यक्ष, राज्य वित्त आयोग अध्यक्ष और राज्य कृषक आयोग अध्यक्ष के अलावा राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष का पद भी रतलाम को मिला है, जो वरीयता क्रम में मुख्यमन्त्री के साथ 8वें नम्बर पर ही है। नौकरशाहों ने इन सभी को नजरअन्दाज कर दिया। आगामी साल में विधानसभा के चुनाव होना हैं। ऐसी स्थिति में जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के कई अर्थ निकाले जा रहे है। इस एक मुद्दे से यह भी जाहिर हो गया कि सरकार नौकरशाहों की लगाम कसने के कितने ही दावे करे, लेकिन असल में वह स्वाधीनता दिवस पर भी नौकरशाहों के ही अधीन थी। 
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चीनी सामान का बहिष्कार याने रुई लपेटी आग

देश में इन दिनों उग्र राष्ट्रवाद और कट्टर धर्मान्धता की अफीम का समन्दर ठाठें मार रहा है। भ्रष्टाचार और कालेधन का खात्मा न होना, बढ़ती बेरोजगारी, स्कूलों-कॉलेजों में दिन-प्रति-दिन कम होते जा रहे शिक्षक, घटती जा रही चिकित्सा सुविधाएँ, किसानों की बढ़ती आत्महत्याएँ जैसे मूल मुद्दे परे धकेल दिए गए हैं। असहमत लोगों को देशद्रोही घोेषित करना और विधर्मियों का खात्मा मानो जीवन लक्ष्य बन गया है।

लेकिन सब लोगों को थोड़ी देर के लिए मूर्ख बनाया जा सकता है। कुछ लोगों को पूरे समय मूर्ख बनाए रखा जा सकता है। किन्तु सब लोगों को पूरे समय मूर्ख नहीं बनाए रखा जा सकता। 

जून और जुलाई के पूरे दो महीने मैं फेस बुक से दूर रहा। गए कुछ दिनों से सरसरी तौर पर देखना शुरु किया। इसी क्रम में राजेश कुमार पाण्डेय की एक पोस्ट नजर आई। घटना सम्भवतः बस्ती (उत्तर प्रदेश) की है। यह पोस्ट मैंने भी साझा की। उसके तीन स्क्रीन शॉट यहाँ दे रहा हूँ। इनमें पूरी पोस्ट पढ़ी जा सकती है। सारी बात अपने आप में स्पष्ट है। अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती।



लोग समझ तो शुरु से रहे थे और समझ रहे हैं लेकिन बोल कोई नहीं रहा था। अब लोगों ने बोलना शुरु कर दिया है। लोग ही क्यों? बोलना तो भाजपा सांसदों ने भी शुरु कर दिया है। यह अलग बात है कि वे चुप रह कर बोल रहे हैं। संसद के सदनों में अपने सांसदों की अनुपस्थिति से खिन्न प्रधान मन्त्री मोदी दो-दो बार उन्हें चेतावनी दे चुके लेकिन अनुपस्थिति का क्रम बना रहा। स्थिति यहाँ तक आ गई कि मोदी को धमकी देनी पड़ी - ‘2019 में देख लूँगा।’

यह सब देख-देख कबीर का एक दोहा बरबस ही याद आ गया। कबीरदासजी से क्षमा याचना सहित, उसमें ‘पाप’ को विस्थापित कर, ‘साँच’ का उपयोग कर रहा हूँ -

साँच छुपाए ना छुपे, छुपे तो मोटा भाग।
दाबी-दूबी ना रहे, रुई लपेटी आग।।

सच सामने आ रहा है। सच हमेशा ताकत देता है। इसी का असर है कि सच लोगों की जबान और सर पर चढ़कर बोलने लगा है। 

सत्य तो सनातन से परीक्षित है। झूठ को ही खुद को साबित करना पड़ता है। परास्त तो अन्ततः झूठ को ही होना है। तब तक सत्य को छोटे-छोटे संकट झेलते रहने पड़ेंगे।
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सेंसरशिप का अनूठा वैश्विक कीर्तिमान








आज सुबह लगभग सवा दस/साढ़े दस बजे मैंने यह पोस्ट लगाई थी। किन्तु थोड़ी ही देर बाद मैंने अनुभव किया कि यह पूर्ण सत्य नहीं थी। इसीलिए यह अनुचित भी थी।

मैं अपनी यह पोस्ट सखेद, क्षमा-याचना सहित हटा रहा हूँ।

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यह अभिलेखीकरण: अपने नायकों के साथ इतिहास में दर्ज होने का अवसर

नौ अगस्त को संसद में, ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के 75 वर्ष पूरे होने के प्रसंग पर बोलते हुए तमाम पार्टियों के नेताओं ने, स्वतन्त्रता संग्राम में अपने-अपने नेताओं के योगदान का उल्लेख किया। दूसरी पार्टियों के नेताओं को या तो भूल गए या जानबूझकर उनकी अनदेखी कर दी। भाजपा के पास अपना कोई स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी नहीं है। सो प्रधान मन्त्री ने उन नेताओं के नाम छोड़ दिए जिनसे उनका पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयम् सेवक संघ नफरत करता है। लगभग तमाम राजनीतिक दलों और तटस्थ प्रेक्षकों ने मोदी के इस व्यवहार को अशालीन निरूपित किया।


यह सब सुनते हुए, भाई साडॉक्टर बंसीधरजी बार-बार याद आने लगे। उनका गाँव भाटखेड़ी का पड़ौसी कस्बा मनासा मेरी जन्मस्थली है। वे बड़ौदा में बस गए हैं। उनकी शिक्षा-दीक्षा मनासा, इन्दौर में हुई। स्वर्गीय डॉक्टर शिव मंगल सिंहजी सुमन के निर्देशन में ‘मालवी की उत्पत्ति और विकास’ विषय पर 1968 में पी. एचडी. करने के बाद 1969 में बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ विश्व विद्यालय में सहायक व्याख्याता के रूप में पदस्थ हुए और पदोन्नत होते-होते 1996 में रीडर बने। नौकरी के दौरान गुजराती के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों की अनेक कृतियों के गुजराती अनुवाद किए। सयाजी राव गायकवाड़ (तृतीय) के जीवन ने उनका ध्यानाकर्षण किया। फलस्वरूप 1992 में ‘भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन में सयाजीराव का योगदान’ शीर्षक से उनकी पुस्तक सामने आई। इसका मराठी अनुवाद छपने की तैयारी में है। सन् 2000 में, सयाजी राव के 20 अंग्रेजी भाषणों का अनुवाद ‘दीर्घ दृष्टा सयाजीराव’ छपा। 2004 में ‘लोक स्मृति में सयाजीराव’ शीर्षक से संस्मरण संकलन पहले हिन्दी में और बाद में गुजराती में आया। सयाजी राव के 250 भाषणों का अनुवाद तीन खण्डों में प्रकाशित करने की योजना के तहत पहला खण्ड प्रकाशन की देहलीज पर है। सयाजी राव के प्रति इस रुझान के चलते 2007 में विश्व विद्यायलय में सयाजी फाउण्डेशन के समन्वयक बनाए गए। 

अपने ईलाज के लिए मैं मई 2016 में बड़ौदा में भर्ती रहा। बंसीधरजी लगातार पूछ-परख के लिए अस्पताल आते रहे। मेरे बहाने वे अपनेे अतीत में टहलते रहे और मैं उनके साथ चलता रहा - मौन। एक दिन उन्होंने ‘ओजस्वी आजाद’ शीर्षक पुस्तक दी। मूल लेखक बीरेन कोठारी हैं। बंसीधरजी ने उसका हिन्दी अनुवाद किया है। संसद में हमारे नेताओं द्वारा की जा रही, एक दूसरे की शिकायत ने मुझे इस पुस्तक की याद दिला दी।

बड़ौदा के मनहर भाई शाह ने बीरेन कोठारी की कलम से अपने स्वर्गीय काका, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी रसिक भाई आजाद के व्यक्तित्व और स्वतन्त्रता संग्राम में उनकी भूमिका का अभिलेखीकरण (डाक्यूमेण्टेशन) करवाया है। ऐसा करने का कोई विचार मनहर भाई के मन में नहीं था। किन्तु हुआ यह कि उनके एक मित्र ने उन्हें एक किताब भेजी। ‘पडकार सामे पुरुषार्थ’ (चुनौती को पार कर पाने का पुरुषार्थ) शीर्षक यह पुस्तक, अहमदाबाद के आदर्श प्रकाशन से जुड़े नवनीत भाई मद्रासी नामक सज्जन पर केन्द्रित थी। वे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे। बीरेन कोठारी इसके लेखक थे। मनहर भाई न तो लेखक को जानते थे न ही पुस्तक के नायक को। पुस्तक पढ़ते-पढ़ते ही मनहर भाई को अपने काका रसिक भाई याद आ गए। उन्होंने कई बार उनसे कहा था - ‘काका! आपके जीवन सम्बन्धी कुछ बातें बोलिए। मैं बैठकर उन्हें कागज पर उतारता जाऊँगा।’ लेकिन रसिक भाई को अपने बारे में बताना अच्छा नहीं लगता था। सो, वे हर बार कोई न कई बात बनाकर टाल देते थे। उनकी मृत्योपरान्त मिले उनके और उनके मित्रों के पुराने पत्रों से उनके काम और उनके व्यापक जीवन की हलकी सी झलक अनुभव हो पाई। मनहर भाई को लगा कि काका के संस्कारों की पूँजी से प्रगति करनेवाली पीढ़ी तो उन्हें जानती है। लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी यह जानकारी धुंधली होती जाएगी। तब, अगली कितनी पीढ़ियाँ उन्हें और उनके कामों को याद रख पाएँगी? इस विचार ने ही मनहर भाई के मन में ‘ओजस्वी आजाद’ का अंकुरण किया। उन्होंने बीरेन कोठारी से सम्पर्क किया। यह संयोग ही रहा कि कोठारीजी की ननिहाल उसी सांढासाल गाँव में थी जो रसिक भाई की मुख्य कार्यस्थली था। मनहर भाई ने अपने पास की सारी सामग्री और सूचनाएँ उन्हें सौंपी। कोठारीजी ने सामग्री का अध्ययन किया, रसिक भाई से जुड़े अधिकाधिक लोगों से भेंट की, उनकी कार्यस्थलियों की यात्रा की। पुस्तक का गुजराती (मूल) संस्करण फरवरी 2014 में प्रकाशित हुआ। हिन्दी के पाठकों को भी रसिक भाई के जीवन से प्रेरणा मिले, इस भावना से उन्होंने बंसीधरजी से इसका हिन्दी अनुवाद कराया।

इस पुस्तक ने मनहर भाई ने एक और महत्वपूर्ण जानकारी दी। कारगिल युद्ध के दौरान 1999 में बड़ौदा के दस गैर सरकारी संगठनों ने मिलकर ‘जन जागृति अभियान’ संगठन गठित कर, ‘याद करो कुर्बानी’ शीर्षक से, अंचल के 68 स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों से जुड़ी सन्दर्भ सामग्री संकलित कर पूरे गुजरात में प्रचारित-प्रसारित करने की योजना बनाई। मीरा बहन भट्ट रचित यह पुस्तक 2013 तक चार जिलों की शालाओं, महाशालाओं, पुस्तकालयों में निःशुल्क पहुँचाई जा चुकी थी। यह क्रम निरन्तर है। बंसीधरजी ने बताया कि ऐसे उपक्रम गुजरात के अन्य अंचलों में कभी व्यक्तिगत स्तर पर तो कभी सांगठनिक स्तर पर होते रहते हैं।

संसद में हमारे राजनेताओं की बातें और शिकायतें सुन कर मुझे ऐसी किताबों की आवश्यकता और प्रासंगिकता तेजी से अनुभव होने लगी। लड़ती तो बेशक पूरी फौज है लेकिन नाम तो सेनापति का ही होता है। इसके अतिरिक्त उन्हीं सैनिकों का उल्लेख हो पाता है जो महत्वपूर्ण घटनाओं या कि परिणामों को प्रभावित करते हैं। लड़नेवाले तमाम सैनिकों की बात तो कोसों दूर रही, मरनेवाले तमाम सैनिकों के नाम भी उल्लेखित कर पाना दुनिया के किसी भी इतिहासकार के लिए सम्भव न तो हो पाया है न ही कभी हो पाएगा। राष्ट्रीय स्तर पर कुछ नाम सामने आएँगे। प्रान्तीय स्तर पर तनिक अधिक नाम साने आ जाएँगे। लेकिन जिला, तहसील, नगर, कस्बा, गाँव स्तर पर अनेक सामने आ जाएँगे। ये सारे नाम प्रायः ही गुमनाम ही रहते हैं। यदा-कदा स्थानीय समारोहों या गोष्ठियों में सामने आ जाएँगे। तमाम लोगों या सूचीबद्ध करने की जिम्मेदारी निभाने में कोई भी सरकार कभी भी सफल नहीं हो सकती। ऐसे में अपने शहीदों, इतिहास पुरुषों की सार-सम्हाल की जिम्मेदारी हमें, स्थानीय स्तर पर ही लेनी पड़ेगी जिस तरह कि ‘जन जागृति अभियान’ और मनहर भाई ने किया। 

अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक मामलों के अलावा बाकी तमाम सामाजिक, सार्वजनिक कामों के लिए हम सरकारों पर आश्रित होते जा रहे हैं। ऐसे में स्थिति ‘महापुरुष हमारे, देखभाल तुम करो’ तक आ पहुँची है। अपने इस व्यवहार पर हमें गम्भीरता से, विस्तृतरूप से पुनर्विचार करना चाहिए। विभिन्न धार्मिक यात्राओं, भण्डारों, आयोजनों पर हम आए दिनों लाखों रुपये खर्च करते रहते हैं। जाहिर है, ऐसे कामों पर खर्च करने के लिए हमारी जेब और दिल बहुत बड़े हैं। अपने अंचल के महापुरुषों, शहीदों, कलाकारों, साहित्यकारों की याद के अभिलेखीकरण (डाक्यूमेण्टेशन) पर बहुत ही कम खर्च आएगा। हम सरकारों को कोसने  के बजाय इन कामों में अपनी भूमिका तय नहीं कर सकते? धार्मिक उपक्रम अखबारों की एक दिन की सुर्खी और लोगों के मन में कुछ दिनों की याद बन कर रह जाएँगे लेकिन यह अभिलेखीकरण हमारे नायकों को ही नहीं हमें भी इतिहास में दर्ज कर देगा। 

फूलों के साथ धागा भी देवताओं के कण्ठ तक पहुँच जाता है। हमारे अपने अंचल के अनगिनत फूल हमारे आसपास बिखरे पड़े हैं। इन्हें  सहेज कर, इनके साथ हम खुद भी समय-देवता के कण्ठ तक नहीं पहुँचना चाहेंगे?
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में, 17 अगस्त 2017 को प्रकाशित)


मुख्यमन्त्री की चेतावनी: अफसरों का चुटकुला

मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम के प्रमुख अभियन्ता  अनिलचन्द सूर्या गए दिनों लेबड़-जावरा फोर लेन सड़क से गुजरे तो गड्ढों से परेशान हो गए। उन्होंने सड़क से ही, सड़क की देख-रेख की जिम्मेदार और टोल वसूल रही, एस्सेल कम्पनी के कर्ता-धर्ता कृष्णा माहेश्वरी को फटकार लगा कर फौरन ही मरम्मत कराने का आदेश देकर पूछा कि क्यों नहीं उनके टोल नाके बन्द कर दिए जाएँ? फटकार और पेट पर पड़ती लात के भय का असर हुआ और अगले ही दिन सड़क मरम्मत का काम शुरु हो गया। गड्ढों से उपजी परेशानी के समाचार अखबारों में लगातार छप रहे थे और लोग नेताओं से भी गुहार लगा रहे थे किन्तु  कोई असर नहीं हो रहा था। इस सड़क से मन्त्री भी आए दिनों यात्रा करते रहते हैं उन्होंने अखबार नहीं पढ़े होंगे लेकिन स्थानीय नेताओं ने तो कहा ही होगा। उन्होंने सुनने की खानापूर्ति कर ली होगी। या फिर हो सकता है, उन्हें अच्छी तरह पता रहा होगा कि उनके कहे का कोई असर नहीं होगा। कह कर बेइज्जती कराने से अच्छा है, कहा ही न जाए। लेकिन अफसर ने यह सब कुछ नहीं सोचा और ‘घण्टों का काम मिनिटों में’ हो गया।

साप्ताहिक ‘उपग्रह’ में खबर पढ़ी कि प्रतिभावान छात्रों की फीस जमा करने के आदेश मुख्य मन्त्री ने महीनों पहले दे दिए। लेकिन फीस अब तक जमा नहीं हुई। अफसर ध्यान ही नहीं दे रहे। सम्वाददाता को मैं जानता था। उससे बात की। उसने एक कदम आगे बढ़कर ताज्जुबवाली बात बताई कि एक समारोह में खुद मुख्य मन्त्री ने यह जानकारी दी और कहा कि वे तो अपना काम कर चुके लेकिन अफसर कार्रवाई नहीं कर रहे। सम्वाददाता ने लगे हाथों एक और बात बताई कि कुछ ही दिन पहले मुख्य मन्त्री एक समारोह में धमकी दे चुके थे कि यदि उनके आदेश का क्रियान्वयन नहीं हुआ तो वे कलेक्टर को उल्टा लटका देंगे। मुझे विश्वास नहीं हुआ कि कोई मुख्य मन्त्री सार्वजनिक रूप से ऐसा कह सकता है। एक कलेक्टर मेरे मित्र हैं। उनसे पूछा। उन्होने हँसते हुए पुष्टि की। मैंने पूछा कि उनकी (आईएएस अफसरों की) जमात ने कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई? हँसते हुए ही वे बोले - ‘क्या आपत्ति जताना? हम सब (अफसर) और प्रदेश की जनता जानती है कि मुख्य मन्त्रीजी जो कहते हैं वह करते नहीं। तालियाँ पिटवाने के लिए ऐसा कहना जरूरी था। कह दिया। तालियाँ पिटवा लीं। अफसरों को जो करना है, अपने हिसाब से करेंगे।’ सुनकर मुझे ताज्जुब तो हुआ, दुःख भी हुआ और बुरा भी लगा। हम जनप्रतिनिधित्व आधारित संसदीय लोकतन्त्र में रह रहे हैं और किसी कलेक्टर को अपने मुख्य मन्त्री के कहे (काम करने) की और चेतावनी की तनिक भी परवाह नहीं! यह तो लोकतन्त्र नहीं अफसर तन्त्र हुआ! लेकिन क्या दुखी होऊँ और क्या बुरा मानूँ। सूर्याजी का उदाहरण मेरे सामने था।

खुद ने देखा तो नहीं किन्तु बार-बार सुना कि मुख्यमन्त्री (स्वर्गीय) गोविन्द नारायण सिंहजी जब वल्लभ भवन के बरामदों से गुजरते थे तो अफसर लोग, सामने जो दरवाजा नजर आता (भले ही वह सुविधा घर का दरवाजा हो) उसमें घुस जाते। उनके सामने आने से घबराते थे। गोविन्द नारायण सिंहजी आईसीएस और आईपीएस, दोनों पात्रताधारी थे। कोई अफसर उन्हें ‘चलाने’ की कोशिश करता तो फौरन पकड़ लेते और भरी भीड़ में उसकी लू उतार देते। उन्हें मूर्ख बनाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन था। 

यह किस्सा खुद दादा ने सुनाया था। वे 1967 में पहली बार विधायक बने थे। पं. द्वारका प्रसादजी मिश्र ने उन्हें उम्मीदवार बनवाया था। अपने मन्त्री मण्डल मे उन्होंने दादा को सामान्य प्रशासन विभाग का संसदीय सचिव बनाया था। दादा को नियमित रूप से मिश्रजी के दफ्तर में उपस्थिति देनी होती थी। एक बार उन्होंने दादा से कहा - ‘बस्तर कलेक्टर से बात कराओ।’ दादा ने ट्रंक बुकिंग  नम्बर मिला कर कहा - ‘प्लीज बुक एन इमीजीएट कॉल फॉर बस्तर.......’ दादा इससे आगे कुछ बोलते, उससे पहले ही मिश्रजी ने डाँटते हुए कहा - ‘फोन रख दो।’  और उसी तरह डाँटते हुए बोले - ‘चीफ मिनिस्टर खुद कलेक्टर से बात करेगा? आगे से ध्यान रखना। चीफ मिनिस्टर को यदि कलेक्टर से बात करनी है तो कमिश्नर से कहो कि अपनी कमिश्नरी के फलाँ कलेक्टर से कहे कि वह सी एम से बात करे।’ लेकिन यह 1967 की बात है। तब से लेकर अब तक तो नदियों में इतना पानी बह गया कि मुख्यमन्त्री की, कलेक्टर को उल्टा टाँग देने की धमकी चुटकुले की तरह सुनी जाती है।

दा साहब स्वर्गीय माणक भाई अग्रवाल कहा करते थे - ‘सरकार नहीं चलती। सरकार का जलवा चलता है।’ यह ‘जलवा’ सेठीजी (स्व. प्रकाशचन्द्रजी सेठी) के मुख्यमन्त्रित्व काल में भी सतह पर ही नजर आता था। सेठीजी का आदेश अफसरों के लिए चेतावनी की तरह होता था। वे किसी का बुरा नहीं करते थे (सम्भवतः किसी का बुरा किया भी नहीं होगा) किन्तु बुरा हो जाने का भय बराबर बना रहता था। 

1977 से 1991 तक के चौदह वर्षों तक मैं एक दवा उत्पादक लघु उद्योग में भागीदार रहा। उसी दौरान 1987 में मुझे संभागीय उद्योग संघ का सचिव बनाया गया। तब तक मैं राजनीति, प्रशासन और पत्रकारिता के गलियारों में अपने स्तर के मुताबिक घूम चुका था। मुझे समझ आ गई थी कि समस्याओं के निदान के लिए अफसर ही उपयोगी और सहायक होते हैं। मुझे सचिव के प्रभार में दो समस्याएँ मिली थीं। पहली - छाता बनानेवाली चार इकाइयों की सेल्स टैक्स सबसीडी न मिलना और दूसरी - नायलोन रस्सी पर अनुचित कराधान। दोनों के लिए स्थानीय नेताओं और मन्त्रियों से भरपूर निवेदन-ज्ञापन हो चुके थे लेकिन निदान नहीं हो रहा था। हम लोगों ने तत्कालीन सेल्स टैक्स कमिश्नर प्रमोद कुमारजी दास को और तत्कालीन उद्योग सचिव (मुझे उनका नाम याद नहीं आ रहा) को अलग-अलग समाराहों में आमन्त्रित किया। पहली समस्या  हाथों हाथ निपट गई। दासजी के जाने से पहले ही सबसीडी जारी करने के आदेश हो गए। दूसरा मामला नीतिगत था। उद्योग सचिव को हमने नायलोन की रस्सी बनाने की पूरी प्रक्रिया मौके पर बताई। उनकी पीठ सुनती है, उन्होंने बड़प्पन बरतते हुए स्वीकार किया कि निर्माण प्रक्रिया देखने के बाद ही वे समस्या समझ पाए। उन्होंने वादा किया (उनके शब्द थे - आई प्रामिस यू) कि भोपाल जाते ही वे सबसे पहले उद्योगों के पक्ष में आदेश जारी करेंगे और उसकी एक प्रति हमें अलग से भिजवाएँगे। उन्होंने अपना वादा अक्षरशः निभाया।  

एक बतरस बैठक में स्वर्गीय सीतारामजी जाजू को कहते सुना था कि अफसरशाही से काम लेना याने शेर की सवारी करना। आपको, सुरक्षित रहते हुए, शेर को नियन्त्रित, लक्ष्य की ओर गतिवान बनाए रखते हुए मुकाम पर पहुँचना होता है। लेकिन मुकाम पर पहुँचना ही पर्याप्त नहीं। वहाँ पहुँच कर सुरक्षित रूप से उतरना भी उतना ही कौशल माँगता है जितना शेर की सवारी करने में। सवारी करने के पहले क्षण से लेकर उतरने के अन्तिम क्षण तक आपको शेर को यह अनुभूति भी करानी होती है कि आप उसके सवार नहीं, मित्र, शुभचिन्तक, हितरक्षक हैं।

प्रत्येक काल खण्ड के अपने मूल्य होते हैं और प्रत्येक व्यक्ति की अपनी कार्य शैली। किन्तु लोक कल्याण स्थायी मूल्य है। यही शासक की कसौटी भी होता है। तब के नेता शायद इसी की चिन्ता करते रहे होंगे। आज उन्हें अपने-अपने हाई कमान की चिन्ता पहले करनी पड़ती है। लेकिन हाई कमान का भी एक हाई कमान होता है - नागरिक। उसकी दुआ भी लगती है और बददुआ भी। यह किसी ने नहीं भूलना चाहिए।
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’ भोपाल में, 10 अगस्त 2017 को प्रकाशित)

चीनी सामान, देश-भक्ति याने फिक्र का जिक्र

हम प्रतीकीकरण के चरम समय में जी रहे हैं। पाखण्ड और प्रदर्शन ने आचरण को खारिज कर विस्थापित कर दिया है। देश-भक्ति इस पाखण्ड प्रदर्शन का सर्वोत्कृष्ट, श्रेष्ठ-उपयोगी और श्रेष्ठ परिणाम देनेवाला तत्व बन गया है। चोरी-कालाबाजारी करो, गरीबों को लूटो, सेक्स रेकेट चलाओ, देश के विरुद्ध जासूसी करो, संविधान की भावनाओं की हत्या करो लेकिन यदि वन्दे मातरम् का नारा लगा दिया तो आप प्रशंसनीय और अनुकरणीय देश भक्त हैं। आप ईमानदारी से देश के सारे कानून मान रहे हैं, सपने में भी देश का अहित नहीं सोचते, संविधान को अपने धार्मिक ग्रन्थ की तरह मानकर उसकी भावनाओं, उसके निर्देशों का पालन करते हैं लेकिन वन्दे मातरम् नहीं कह पाते हैं तो आप देशद्रोही हैं, आपने खुद को पाकिस्तान भेजे जाने की पात्रता हासिल कर ली है।

कोई बीस-बाईस बरस पहले एक सज्जन ने सुनाया था - ‘काम मत कर। काम की फिक्र कर। फिक्र का जिक्र कर। तेरा प्रमोशन पक्का।’ देशभक्ति के नाम पर आज यही हो रहा है। 

पहली अगस्त से देश में एक अभियान शुरु हुआ है - चीनी सामान का बहिष्कार करने का। वस्तुतः यह इस अभियान का दूसरा भाग है। पहला भाग गत वर्ष दीपावली पर सम्पन्न हुआ था। तब हमने चीन निर्मित पटाखों, फुलझड़ियों, झालरों का बहिष्कार किया था। देश भक्ति जताई थी। खूब खुश हुए थे। पटाखे फोड़ कर खुशी जताई थी। यह अलग बात है कि खुशी के आवेग में भूल कर चीनी पटाखे ही फोड़ बैठे। 

देश भक्ति और राष्ट्र प्रेम के अधीन अपनी शक्ति, अपनी क्षमता, अपना इतिहास ही भूल बैठे। यह भूलना कोई रणनीति है या भावावेग - इस पर बहस की जा सकती है। हम भूल गए कि चोर को नहीं, चोर की माँ को मारना चाहिए। हम भूल गए कि खरीदनेवालों के मुकाबले बेचनेवाले बहुत कम हैं। ये बेचनेवाले हमारे अपने ही लोग हैं। याद नहीं आया कि इनसे कहें कि चीनी सामान न बेचें। अपनी सरकार बनाने के लिए दूसरी पार्टी के विधायकों को खरीदने को सही बताते हुए, अभी-अभी अनुपम खेर ने कहा - ‘खरीदा वही जाता है जो बिकता है।’ इस सूत्र की तरफ ध्यान नहीं गया। सामान यदि बाजार में दुकानों पर उपलब्ध है तो बिकेगा ही। देश भक्ति और राष्ट्र प्रेम के भावावेग में हम भूल गए कि रोज सुबह हमारे साथ कवायद करनेवाले अनगिनत सेवक चीनी सामान के विक्रेता हैं। हम भूल गए कि इनसे कहें कि यह सामान मत बेचो। हम भूल गए कि अपनी संस्कृति और धर्म-रक्षा के लिए कुछ भी कर गुजरनेवाले अनगिनत सैनिक हमारे पास हैं। वेलेण्टाइन डे पर बधाई पत्रों की दुकानों को ध्वस्त कर देनेवाले अपने वीरों को हम भूल गए। हम उन्हें ही कह सकते थे कि चीनी सामान बेचनेवाली दुकानों पर अपनी ‘कृपा दृष्टि’ डाल दें। गौ रक्षा के लिए और लव जेहाद का नाश करने के लिए प्राण लेने में भी न हिचकनेवाले शूरवीर हमें याद नहीं आ रहे। पार्टी में संगठन मन्त्री और सरकार में मन्त्री कौन बने, इस व्यस्तता में हम भूल गए कि हम अपनी ही सरकार से चीनी सामान पर प्रतिबन्ध लगाने का आदेश जारी न करा पाए। हमें एक ही बात याद रही - देश के लोग देश भक्ति और राष्ट्र प्रेम भूल न जाएँ इसलिए घर-घर जाकर याद दिलाएँगे। लोगों को मालूम होना चाहिए कि हमें देश की और उनकी कितनी फिक्र है!


एक ऑडियो इन दिनों वाट्स एप पर खूब चल रहा है। मुझे अब तक सत्रह मित्रों से प्राप्त हो चुका है। इनमें से तीन ऐसे हैं जो खुद के सिवाय किसी को भी देश भक्त नहीं मानते। किन्हीं डाक्टर अनुराग के, लगभग साढ़े तेरह मिनिट के इस ऑडियो में अनेक छोटे-छोटे सवाल पूछे गए हैं और अनेक छोटी-छोटी जानकारियाँ दी गई हैं। जैसे, यदि चीन हमारा दुश्मन है तो प्रधान मन्त्री ने अब तक विरोध क्यों नहीं जताया? वे तीन बार चीन जाकर भारत में निवेश करने का आग्रह कर चुके हैं! हम कौन-कौन सा सामान नहीं वापरें या नहीं खरीदें? घर, दफ्तर, संस्थानों, हमारे दैनन्दिन जीवन में काम आ रहा कौन सा सामान ऐसा है जो चीन में न बना हो या जिसमें चीनी सामान न लगा हो? आधुनिक चिकित्सा उपकरणों के लिए हम विदेशों पर ही निर्भर हैं। इनमें से लगभग अस्सी प्रतिशत उपकरण पूर्णतः या आंशिक चीनी ही हैं। हम चीन से आयात बन्द क्यों नहीं कर देते? चीन अपने सकल निर्यात का अधिकतक तीन प्रतिशत ही भारत को निर्यात करता है। वह हम पर निर्भर नहीं है। इसके समानान्तर हम अपने सकल निर्यात का ग्यारह प्रतिशत निर्यात चीन को करते हैं। हम यह नुकसान उठाने को तैयार हैं? भारत में सत्ताईस हजार चीनी रहते हैं। इन्हें चीन क्यों नहीं भेज देते? लेकिन चीन में लगभग साढ़े चार लाख भारतीय काम कर रहे हैं। उनके लिए हमारे पास रोजगार हैं? चीनी सामान से जुड़े व्यापार, उत्पादन पर लगभग आठ करोड़ परिवार (लगभग चालीस करोड़ लोग) निर्भर हैं। इनके रोजगार का क्या होगा? खास कर तब जबकि आजादी के बाद से अब तक कुल नब्बे लाख सरकारी नौकरियाँ ही मिली हैं। 

अपनी गलती, अक्षमता, निष्क्रियता, अपनी काली करतूतें छुपाने का सबसे बढ़िया उपाय है - सामनेवाले को गलत, अक्षम, निकम्मा, चोट्टा-डाकू साबित करना शुरु कर दो। लेकिन इससे सचाई नहीं बदलती। डॉक्टर अनुराग के अनुसार स्कूलों में दिया जा रहा मध्याह्न भोजन तो स्थानीय स्वयम् सेवा समूहों द्वारा ही उपलब्ध कराया जा रहा है, चीन से नहीं। लेकिन सरकारी आँकड़ा है कि इस मध्याह्न भोजन से अब तक सोलह हजार बच्चे मर चुके हैं। नकली/घटिया स्वदेशी दवाओं से छियासी हजार लोगों की जानें चली गईं। ऐसी ही स्वदेशी दवाओं से कोलकोता में आठ हजार बच्चे मर गए। डॉक्टर अनुराग के अनुसार यह भी सरकारी आँकड़ा है। चीनी सामान के बहिष्कार के आह्वान को ‘ढकोसला’ बताते हुए डॉक्टर अनुराग पूछते हैं - ‘अपने पीएम चीनियों को भारत में आकर सामान बनाने को कह रहे हैं। उनका बनाया सामान न खरीद कर हम अपने पीएम का निरादर नहीं कर रहे? उनकी मेहनत पर पानी नहीं फेर रहे?’ डॉक्टर अनुराग के अनुसार हम चीन का फायदा कम और अपना फायदा ज्यादा कर रहे हैं। चीनी तकनीक का उपयोग कर हम आगे बढ़ रहे हैं। भारत में चीनी सामान की बिक्री का कुल चार प्रतिशत पैसा चीन को जाता है। शेष छियानवे प्रतिशत भारत में ही रहता है। साल में दो बार भारतीय और चीनी सेनाएँ साथ-साथ युद्धाभ्यास कर, परस्पर अनुभवों का लाभ लेती हैं। सच तो यह है कि हमारा स्वदेशी सामान चीनी सामान से कम गुणवत्तावाला और मँहगा है। देश भक्ति के नाम पर यह सब करने के बजाय हमें प्रतियोगिता कर खुद को बेहतर साबित करना चाहिए। यही चीन को सच्चा और प्रभावी जवाब होगा। 

मैं भी उलझन में हूँ। जिन तरीकों, माध्यमों से चीनी सामान के बहिष्कार का अभियान चलाया जा रहा है उनमें चीन है। मैं जिस कम्प्यूटर पर यह सब लिख रहा हूँ, वह चीनी पुर्जों से ही बना है। जिस इण्टरनेट से इसे अखबार तक भेज रहा हूँ, उसमें भी चीन शामिल है। जाहिर है, समूचा अभियान एक नकली लड़ाई है। योद्धा प्राणों की आहुति देने की मुद्रा में लकड़ी की तलवारों से दुश्मन को मौत के घाट उतारने के लिए जूझ रहे हैं। मुखौटों की त्यौरियाँ चढ़ी हुई हैं। देश की फिक्र का जिक्र करने में मुखौटों की आँखों से आँसू धार-धार बह रहे हैं। पपोटे सूज गए हैं।

ठीक वक्त है कि हम अपनी-अपनी भूमिका तय कर लें।
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में, 03 अगस्त 2017 को प्रकाशित)