लड़ी जा सकनेवाली एक लड़ाई

पूरा देश राष्ट्रोन्माद और गुस्से में उफन रहा है। विदेशों में बैठे भारतीय भी इसी दशा में हैं। सबकी एक ही इच्छा है-इस बार पाकिस्तान को निपटा ही दिया जाए। यह भावना अकारण नहीं है। लोक सभा चुनावों के दौरान पाकिस्तान के सन्दर्भ में मोदी ने लोगों को जो भरोसा दिलाया था, उसी भरोसे के आधार पर लोग न केवल यह चाह रहे हैं बल्कि विश्वास भी कर रहे हैं कि मोदी अपनी बात पर अमल करेंगे। लेकिन मोदी की आवाज सुनाई ही नहीं दे रही। और केवल मोदी ही क्यों? राष्ट्रवाद की दुहाइयाँ देनेवाले संघ परिवार और तमाम भाजपाइयों की भी आवाज नहीं सुनाई दे रही। कल तक खुद के सिवाय बाकी सब को देशद्रोही घोषित करनेवाले तमाम लोगों को मानो साँप सूँघ गया है। यह देख-देख कर मुझे मालवी का यह लोक आख्यान पल-पल याद आ रहा है।

लोगों को प्रभावित करने के लिए एक नौजवान बीच चौराहे पर, भीड़ के सामने हँसिये निगलने लगा। अधिकांश लोग तो उसके इस करतब पर तालियाँ बजाते रहे किन्तु कुछ समझदार लोग भाग कर उसके पिता के पास पहुँचे और कहा कि अपने बेटे को यह आत्मघाती करिश्मा करने से रोके। पिता अपने बेटे से पहले से ही परेशान था चिढ़ कर बोला कि वह जो करता है, करने दें। अभी उसे मजा आ रहा है लेकिन सुबह जब निपटने जाएगा तब उसे मालूम पड़ेगा कि उसने क्या मूर्खता की। पिता ने जो कहा, वही हुआ। कुछ घण्टों पहले तालियों की गड़गड़ाहट से बौराया बेटा, सुबह शौचालय में, लहू-लुहान दशा में चित्कार रहा था। 
आख्यान में और आज की दशा में एक ही अन्तर है। वहाँ वह नौजवान चिल्ला रहा था। यहाँ, राष्ट्र को लेकर गर्वोक्तियाँ करने का छोटा से छोटा मौका भी हथियाने वाले तमाम लोगो की बोलती बन्द है। सवाल पूछनेवालों में पराये तो हैं ही, अपनेवाले भी बड़ी तादाद में सामने आ रहे हैं। मोदी और अन्य भाजपाइयों के आक्रामक भाषणों के वीडियो अंश सोशल मीडिया पर छााए हुए हैं। लोग क्षुब्ध होकर व्यंग्योक्तियाँ कस रहे हैं। पुराने भाषणों को चुटकुलों की तरह पेश कर रहे हैं। सर्वाधिक फजीहत ‘छप्पन इंच का सीना’ की हो रही है। कल तक राष्ट्रवाद के प्रमाण-पत्र बाँटनेवाले मुँह छिपा रहे हैं और जिन्हें देशद्रोही करार देकर पाकिस्तान भेजने की बात की जा रही थी वे तमाम लोग, पूर्वानुसार ही सहज भाव से देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं-चुपचाप।

वस्तुतः कुछ भी अनोखा नहीं हो रहा। आकांक्षाए जगाना जितना आसान है, उन्हें पूरा करना उतना ही कठिन। मुझे लगता है, इन सबसे एक ही चूक हुई-यह जानते हुए भी कि भारत अपनी ओर से पाकिस्तान पर आक्रमण नहीं करेगा, ये लोग भावनाएँ भड़काते रहे। याद कीजिए, गृह मन्त्री राजनाथसिंह कह चुके हैं कि पहली गोली भारत नहीं चलाएगा। उन्होंने अपना यह वक्तव्य इस क्षण तक न तो वापस लिया है न ही संशोधित किया है। सत्ता में आकर अपने विरोधियों को नष्ट करने की जो निर्द्वन्द्व आजादी मिलती है, अन्तरराष्ट्रीय बिसात पर वह नहीं मिलती। पाकिस्तान की वास्तविक स्थिति ने शुरु से ही सबके हाथ बाँध रखे हैं। वहाँ प्रधान मन्त्री सहित तमाम निर्वाचित जनप्रतिनिधि सेना के बन्धक हैं। कठपुतलियों की तरह निष्प्राण, निर्जीव। कुर्सी पर बने रहने के लिए सेना की इच्छा का पालन करना पड़ता है। सेना अपनी मनमर्जी से कुछ भी कर सकती है, नेता नहीं। कारगिल युद्ध इसका प्रमाण है। मुशर्रफ ने नवाज शरीफ का कहना मानने से इंकार कर दिया था और भारत पर युद्ध थोप दिया गया था। 

सारी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान के आतंकी सेना की शह और संसाधनों से लैस रहते हैं। किन्तु वहाँ का कोई सैनिक सामने नहीं आता। जिहाद के नाम पर दिग्भ्रमित युवा ही सरहद पार करते हैं। उनका जो भी किया-कराया है, सब कुछ अनधिकृत, अनौपचारिक होता है। इन सबमें सरकार का हाथ न होने की बात कहने की सुविधा वहाँ की सरकार को मिलती रहती है। ऐसे में तकनीकी तौर पर सरकार सदैव बरी-जिम्मे रहती है। सारी दुनिया भली प्रकार जानती है आतंकवादी पाकिस्तानी हैं किन्तु घुसपैठ या हमला पाकिस्तान ने नहीं किया होता है। ऐसे में हम चाह कर भी हमला नहीं कर सकते और यही वजह है कि राजनाथसिंह अपने वक्तव्य पर बने रहने को मजबूर हैं। वे हमारे गुस्से के नहीं, सहानुभूति के पात्र हैं। हम चुप रहकर उनका हौसला बढ़ाएँ, उन्हें मदद करें।

इस तकनीकी पेचीदगी के चलते हम सीधा आक्रमण तभी कर सकते हैं जब हम आक्रामक होने का तमगा कबूल करने को तैयार हों। निश्चय ही, हम यह तमगा कभी हासिल नहीं करना चाहेंगे। ऐसी स्थिति मे हमारे पास कोई नया विकल्प नहीं है। हमें अपने (वार्ता करने, राजनयिक , कूटनीतिक प्रयासों से पाकिस्तान को सारी दुनिया से अलग-थलग करने के) चिर-परिचित विकल्पों पर ही काम करना पड़ेगा। इन विकल्पों में हम कितना कौशल वापर सकते हैं, यही महत्वपूर्ण बात होगी।

मैं ठेठ देहाती आदमी हूँ। सीधी बात कहने-सुनने में आसानी होती है। कूटनीति या राजनय के दाँव मुझे नहीं आते। निजी तौर मैं अमरीका को मूल अपराधी मानता हूँ। मेरी राय में पाकिस्तान यदि चोर है तो अमरीका चोर की माँ है। मैं पाकिस्तान को अमरीका का रण्नीतिक उपनिवेश मानता हूँ। इनमें चीन, पाकिस्तान की मौसी की तरह शामिल हो गया है। मुझे लगता है कि पाकिस्तान का इलाज करने के लिए हमे अमरीका और चीन का इलाज करने पर विचार करना चाहिए। किन्तु इन दोनों से भी हम सीधी लड़ाई नहीं लड़ सकते। 

हमारे देहातों में कहा जाता है कि यदि किसी को मारना हो तो उसकी पीठ पर नहीं, पेट पर लात मारो। मेरा विश्वास है कि हम इन दोनों देशों के पेट पर लात मारने की जोरदार स्थिति में हैं। हम दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बने हुए हैं। कुछ ऐसा कि कभी-कभी लगता है कि हम भारतवासी खुद उत्पाद बन गए हैं। चीनी सामान से हमारे बाजार अटे पड़े हैं। हम सब इनसे त्रस्त हैं, यह बात बार-बार सामने आती रहती है। सरकार इस मामले में कुछ नहीं कर सकती। उसके हाथ भी बँधे हुए हैं मुँह भी बन्द ही है। वह तो कुछ कर नहीं सकती। किन्तु हम, भारत के लोग काफी-कुछ कर सकते हैं। दुकानदार चीनी सामान की बिक्री बन्द कर दें और हम खरीददारी, तो चीन का दिमाग ठिकाने आ जाएगा।

अमरीकी उत्पाद तो हमारे खून में शामिल हो गए हैं। अमरीकी उत्पादों ने भारतीय चोला पहन लिया है। कौन सी चीज अमरीकी है और कौन सी नहीं, तय करना मुश्किल हो गया है। किन्तु वहाँ के (कोका कोला और पेप्सी जैसे तमाम) शीतल पेय तो जग जाहिर हैं। हम इनका ही बहिष्कार कर दें तो अमरीका घुटनों पर आ जाएगा। हम में से बहुत कम लोग जानते होेगे कि शीतल पेयों की ये कम्पनियाँ अमरीका की अर्थनीति में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। अमरीका अपनी अर्थ नीति निर्धारण में इन कम्पनियों का विशेष ध्यान रखता है। आर्थिक लाभ के मामले में पाकिस्तान, अमरीका के लिए तनिक भी उपयोगी नहीं है किन्तु हमसे तो अमरीका मालामाल हुआ जा रहा है। भारत के बाजार को खोने की जोखिम वह कभी नहीं उठा पाएगा।

मोदी इस समय देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। पार्टी से परे, निजी स्तर पर उनके अनुयायियों की संख्या भी कम नहीं। ठीक है कि वे कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं। किन्तु वे पर्दे के पीछे से यह अभियान छेड़ सकते हैं। आज का माहौल ऐसे अभियान के लिए अत्‍यधिक अनुकूल है।

हम, पाकिस्तान से सर्वाधिक त्रस्त देश हैं। हम सीधा युद्ध तो शुरु नहीं कर सकते किन्तु पाकिस्तानी सेना की तरह छù युद्ध तो लड़ ही सकते हैं। एक ही अन्तर होगा। हमारी यह लड़ाई धीमी होगी, देर से नतीजा देनेवाली और भारत में ही लड़ी जाएगी।

एक लड़ाई ऐसी भी लड़ने पर विचार करने में हर्ज ही क्या है? 
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(भोपाल से प्रकाशित दैनिक ‘सुबह सवेरे’ के दिनांक 22 सितम्बर 2016 के अंक में छपा)