इन्दिरा काल की ऋण मुक्ति की वापसी

नोट बन्दी लागू होने के बाद मची अफरा-तफरी के बार से, अपनी योजना को लेकर सरकार द्वारा लगभग रोज ही कोई न कोई बदलाव करने या स्पष्टीकरण देने के बावजूद मैं मानकर चल रहा था कि सरकार ने सब कुछ सुविचारित-सुनियोजित किया है। किन्तु शनिवार तीन दिसम्बर को मुरादाबाद में हुई भाजपा रैली में प्रधान मन्त्री मोदी के भाषण में जन-धन खातों में जमा धन को लेकर खताधारकों को दी गई लोक-लुभावन सलाह और उसके बाद कही बात ने मुझे अपनी धारणा पर सन्देह होने लगा है। जन-धन खाताधारकों को जमा रकम (उसके वास्तविक स्वामियों को) वापस न करने की सलाह देने के बाद मोदी ने कहा कि वे अपना दिमाग खपा रहे हैं कि जन-धन खातों में जमा धन कैसे गरीबों का हो जाए। यह बात पढ़ कर मैं चौंक गया। अपने पढ़े पर विश्वास नहीं हुआ। विश्वास नहीं हुआ कि देश में उथल-पुथल मचा देनेवाले निर्णय को लेकर कोई प्रधान मन्त्री ऐसा कह सकता है।

मुझे सयानों की वह बात याद आ गई जिसके अनुसार दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं। श्रेष्ठ श्रेणी के लोग सोच कर बोलते हैं। मध्यम श्रेणी के लोग बोल कर सोचते हैं और निकृष्ट श्रेणी के लोग न तो सोच कर बोलते हैं न ही बोलने के बाद सोचते हैं। इसके समानान्तर ही मुझे एक श्लोक याद आने लगा जो मैंने भानपुरा पीठ के शंकराचार्यजी से सुना था जिसमेें कहा गया था कि राजा के चित्त का अनुमान देवता भी नहीं कर पाते।  किन्तु श्लोक मुझे याद नहीं रहा। मैंने जलजजी, भगवानलालजी पुरोहित और मन्दसौर में रह रहे मेरे कक्षा पाठी रामप्रसाद शर्मा को टटोला। रामप्रसाद पुरोहिती-पण्डिताई करता है। पहली बार में सबने हाथ खड़े कर दिए। लेकिन कोई दो घण्टों बाद जलजजी ने और अगली सुबह रामप्रसाद ने मेरा मनोरथ पूरा कर दिया। मनुस्मृति का यह श्लोक इस प्रकार है -

नृपस्य चित्तम्, कृपणस्य वित्तम्, मनोरथ दुर्जन मानुषानाम्।
त्रिया चरित्रम्, पुरुषस्य भाग्यम्, दैवो न जानाती, कुतो मनुष्यः।।

अर्थात् राजा के मन की बात, कंजूस व्यक्ति के धन, दुर्जन व्यक्ति की मनोकामना, स्त्री के स्वभाव-व्यवहार और पुरुष के भाग्य के बारे में देवता भी नहीं जान पाते तो साधारण मनुष्य की क्या बिसात कि यह सब जान ले। मोदी देश के प्रधान मन्त्री, देश के राजा हैं। वे वैसे भी इस गुण के कारण अलग से पहचाने जाते हैं कि उनके मन की बात का अनुमान कोई नहीं कर पाता। यहाँ तक कि उनके सहयोगी मन्त्री भी चौबीसों घण्टे ‘मोदी सरप्राइज’ के लिए तैयार रहते हैं। किन्तु मुरादाबाद में कही बात से तो साफ लगता है कि खुद उन्हें ही पता नहीं कि वे क्या चाहते हैं। परोक्षतः उन्होंने देश को सूचित किया है कि वे निर्णय पहले लेते हैं और योजना (और उसके क्रियान्वयन) पर बाद में सोचते हैं। उनकी यह बात, नोटबन्दी लागू होने के बाद आए, योजना में रोज-रोज किए गए बदलावों और दिए गए स्पष्टीकरणों से अपने आप जुड़ जाती है और लोगों को इस निष्कर्ष पर पहुँचने की छूट देती है कि यह योजना सुविचारित-सुनियोजित नहीं है। योजना लागू होने के बाद से आज तक एक दिन भी सामान्य नहीं बीता है। योजना के प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रभावों से प्राण गँवानेवालों की संख्या सौ के आँकड़े की ओर सरकती नजर आ रही है। अब तो लगता है मानो ‘तब की तब देखी जाएगी’ वाली मनःस्थित में योजना लागू कर दी गई हो। निश्चय ही यह सब न तो सरकार के लिए अच्छा है न ही ‘टाइम’ पत्रिका द्वारा ‘वर्ष का नायक’ (मेन ऑफ द ईयर) जैसे अन्तरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्रतीक से नवाजे जानेवाले मोदी के लिए। 

जन-धन खातों में जमा रकम उसके मूल स्वामियों को न लौटाने की सलाह देते समय मोदी यदि इन्दिरा गाँधी की ’ऋण-मुक्ति’ योजना और उसके परिणामों को याद कर लेते तो सबके लिए अच्छा होता। इन्दिरा गाँधी की इस महत्वाकांक्षी योजना के अन्तर्गत गाँवों के लोगों को साहूकारों के कर्ज से तो मुक्ति मिल गई थी किन्तु उसके बाद ऋण-मुक्त लोगों की सुध किसी ने नहीं ली और वे अनाथों से भी बदतर दुर्दशा में आ गए थे। हमारी ग्रामीण अर्थ व्यवस्था आज भी कर्ज पर ही आश्रित है। इन्दिरा गाँधी के काल में किसानों को बैंकों से इतनी आसानी से और इतना सुविधाजनक कर्ज नहीं मिलता था। किसान मँहगी दर पर ब्याज देनेवाले साहूकारों पर ही निर्भर थे। इन्दिरा गाँधी की योजना से साहूकारों ने ब्याज ही नहीं अपना मूल धन भी खो दिया था। इससे नाराज हो  साहूकारों ने किसानों को कर्ज देना ही बन्द कर दिया। दूसरी ओर बैंकों से कर्ज मिलना शुरु नहीं हुआ। हालत यह हो गई थी कि किसान अपने खेत तैयार कर खाद-बीज से खाली हाथों अपना माथा टेके खेत की मेड़ पर बैठे मिलते थे। बैंक और सरकार मदद को सामने आए नहीं और दूध के जले साहूकारों ने पीठ फेर ली। परिणामस्वरूप, ‘गरीबी हटाओ’ का लोक-लुभावन नारा देने वाली इन्दिरा के राज में गरीब पूरी तरह भगवान भरोसे हो गए थे। जन-धन खातों में जमा रकम वापस न करने की सलाह देकर मोदी उसी इतिहास को नहीं दोहरा रहे?

काला धन सारे जन-धन खातों में जमा नहीं हुआ है। सामने आए आँकड़ों के मुताबिक ऐसे खाते एक प्रतिशत ही हैं। याने, मोदी यदि इसे गरीबों को नोटबन्दी से होनेवाला लाभ मानते हैं तो लगभग निन्यानबे प्रतिशत गरीब तो इस लाभ से वंचित रह गए। दूसरी बात, जिनके खातों में रकम जमा हुई है, वे सब के सब अपनी रोजी-रोटी के लिए उन्हीं पर निर्भर हैं जिनकी रकम है। अपवादस्वरूप ही किसी खाते में इतनी रकम जमा हुई होगी कि जो जिन्दगी बना दे। आज की तारीख में कोई भी अपनी रकम एक साथ पूरी की पूरी नहीं निकाल सकता। अपना काम-धन्धा शुरु करने के लिए एक मुश्त रकम चाहिए। रकम न लौटानेवाले को रकम का मूल स्वामी हमेशा के लिए नमस्कार कर लेगा। रकम ने यदि जिन्दगी भर साथ न दिया तो रोजगार के लिए कोई नया मालिक तलाश करना पड़ेगा। नए मालिक तक यदि विश्वासघात की कहानी पहुँच गई तो? इन सारी बातों से बढ़कर और सबसे पहले, अन्तरात्मा का भय। लोक अनुभव है कि गरीब आदमी लालची नहीं होता। गरीब की ईमानदारी के अनगिनत किस्से हमारे आसपास ही बिखरे हुए हैं। रोटी के लिए वह भीख माँग लेगा लेकिन चोरी नहीं करेगा। हम देख रहे हैं कि (चोरी करने का) यह काम भरे पेटवाले बड़े लोग ही करते हैं। ऐसे में, रकम का मूल स्वामी न भी कहेगा तो भी लोग यह रकम लौटा देंगे। तब हो सकता है कि कार्पोरेट घरानों की मदद से सिंहासन तक पहुँचने की सफलता हासिल करनेवाले मोदी के इस मनोरथ को देश के गरीब विफल कर दें। मोदी के आह्वान पर यदि लोगों ने अमल करने की हिम्मत कर भी ली तो ‘मालिक-मजदूर’ का रिश्ता संदिग्ध हो जाएगा। यह सर्वथा नया, अकल्पनीय सामाजिक-आर्थिक संकट होगा। गिनती के कुछ गरीब जरूर सम्पन्न हो जाएँगे।  किन्तु गरीब की ईमानदारी संदिग्ध हो जाएगी और लोगों को मजदूरी हासिल करने में मुश्किल होने लगेगी। यह विचित्र स्थिति होगी।

पता नहीं ‘राजा’ के मन में क्या है। कोई कल्पना करे भी तो कैसे? अभी तो राजा खुद ही अपने मन की बात नहीं जानता! यह स्थिति किसी के लिए सुखद नहीं है। यह ठीक समय है जब नोटबन्दी की विस्तृत योजना देश के सामने सुस्पष्ट तरीके से रख दी जाए। योजना संदिग्ध हो, चलेगा। किन्तु अपने अनिश्चय, अस्पष्टता के कारण ‘राजा’ पर सन्देह करने की स्थिति बने, यह किसी के लिए हितकारी नहीं है। न देश के लिए, न ही खुद ‘राजा’ के लिए।
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