मोदी से माफी माँग लें गाँधी प्रेमी

कठोर मुख-मुद्रा और हाथ में पोनी लिए बिना, चरखे पर सूत कातने का उपक्रम कर रहे, प्रधान मन्त्री मोदी के चित्र को लेकर उनके विरोधी और अनेक गाँधी-प्रेमी मोदी पर टूट पड़े हैं। मुझे हैरत नहीं हो रही न ही गुस्सा आ रहा। मुझे दोनों पर तरस और हँसी आ रही है। गुस्सा करनेवाले यदि केवल मोदी ही नहीं, समूचे संघ परिवार के संकट और हीनताबोध का अनुमान लगा पाते तो वे भी हँसतेे।

संघ और भाजपा सहित उसके तमाम अनुषांगिक संगठनों का सबसे बड़ा संकट है-उनके पास अपना एक भी महापुरुष नहीं। सारी दुनिया जानती है कि भारत के स्वाधीनता संग्राम से संघ ने खुद को घोषित रूप से दूर रखा क्योंकि वह  ‘हिन्दू भारत’ चाहता था जबकि गाँधी और काँग्रेस ऐसे स्वतन्त्र भारत के लिए संघर्षरत थे जिसमें सब धर्मों, मतों, सम्प्रदायों, समुदाय के लोगों के लिए बराबर की जगह थी। 

महापुरुषविहीन ऐसी स्थिति में कोई भी वही करता जो संघ परिवार और मोदी कर रहे हैं। उन्हें ऐसा अतीत और ऐसे व्यक्तित्व चाहिए जिनके सहारे गर्वपूर्वक लोगों के बीच जा सके। हीनताबोध से कभी मुक्ति नहीं पाई जा सकती क्योंकि हम खुद से झूठ नहीं बोल सकते। इसलिए संघ परिवार समय-समय पर ऐसे व्यक्तित्वों का अवलम्बन लेता रहता है जो जनमानस में श्रेष्ठ चरित्र, उत्कृष्ट देशभक्ति और प्रतिभा-वैशिष्ट सम्पन्न हों। लेकिन इसके समानान्तर वह यह चतुराई भी बरतता है कि किसी भी व्यक्तित्व को अपनी स्थायी पहचान कभी नहीं बनाता। कभी वह सरदार पटेल को लेकर आता है, कभी विवेकानन्द को, कभी भगतसिंह को, कभी महाराणा प्रताप को, कभी शिवाजी को, कभी नेताजी सुभाषचन्द्र बोस आदि-आदि को। संघ भली प्रकार जानता है कि यदि किसी एक को भी अपनी स्थायी सम्पत्ति बनाया तो लेने के देने पड़ जाएँगे क्योंकि ये तमाम चरित्र संघ के सिद्धान्तों, मतों, बातों को सिरे से खारिज करते हैं। 

यह तथ्य इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि सरदार पटेल ने संघ को भारत की साम्प्रदायिक एकता के लिए हानिकारक बताते हुए उसे प्रतिबन्धित करने की सलाह दी थी। गाँधी हत्या में भी सरदार पटले ने संघ की भूमिका का अन्देशा जताया था। भला ऐसे आदमी को संघ अपना स्थायी गर्व पुरुष कैसे बना सकता है?

शहीद-ए-आजम भगतसिंह संघ के प्रमुख गर्व पुरुष हैं। भगतसिंह ने खुद को कम्युनिस्ट और नास्तिक घोषित किया। वे ईश्वर को खारिज करते थे। उनके कारावास काल में जिस महिला (जिसे वे ‘बेबे’ याने माँ कहते थे) ने उनका मल-मूत्र साफ किया, उसके हाथ का बनाया भोजन करना उनकी अन्तिम इच्छा थी। जबकि संघ मनु स्मृति आधारित वर्ण व्यवस्था का समर्थन करता है। इसीलिए संघ भगतसिंह को भी सदैव ही ‘ठीक समय और प्रसंग’ पर ही काम में लेता है। 

शिवाजी और राणा प्रताप को संघ हिन्दू रक्षक रूप में पेश करता है। किन्तु जैसे ही लोग इन दोनों के मुसलमान सेनापतियों के बारे में बताना या पूछना शुरु करते हैं तो फौरन ही विषय बदल दिया जाता है। विस्तार से बात करने पर मालूम होता है कि इन दोनों की विजय में मुसलमान सेनापतियों का अमूल्य योगदान है। 

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को लेकर भी संघ का संकट कम नहीं है। उनकी मृत्यु को लेकर संघ परिवार शुरु से ही नेहरू और काँग्रेस को अपराधी घोषित करता रहा। किन्तु पहले अटलजी की सरकार और अब मोदी सरकार के होते हुए ऐसा कोई दस्तावेज सामने नहीं लाया जा सका। नेताजी से जुड़ी दस्तावेजी सामग्री किश्तों में दे कर सनसनी बनाए रखी जा रही है किन्तु अब तक एक भी ऐसा दस्तावेज सामने नहीं लाया जा सका जो नेहरू की फजीहत कर सके। खास बात यह है कि नेताजी को हिन्दू प्रतीक के रूप में कभी पेश नहीं किया गया क्योंकि सारी दुनिया जानती है कि उनकी आजाद हिन्द फौज में सभी धर्मों के लोग शरीक थे।

विवेकानन्द संघ के सर्वाधिक प्रिय हिन्दू प्रतीक हैं। विवेकानन्द को अन्तरराष्ट्रीय पहचान दिलानेवले, सितम्बर 1893 में, शिकागो में सम्पन्न, 17 दिवसीय धर्म सम्मेलन में उन्होंने 12 व्याख्यान दिए किन्तु एक भी व्याख्यान में किसी धर्म कह निन्दा या आलोचना नहीं की न ही किसी धर्म को छोटा कहा।  उन्होंने कहा कि किसी इसाई को हिन्दू या बौद्ध नहीं बनना है न ही किसी हिन्दू या बौद्ध को इसाई बनना है। उन्होंने प्रत्येक धर्म को अपनी स्वतन्त्रता और विशिष्टता बनाए रखकर दूसरे धर्मों के भाव ग्रहण करते हुए चलने को उन्नति और विकास का मन्त्र बताया। विवेकानन्द ने रोटी को धर्म से पहले माना और उस ईश्वर में अनास्था जताई जो रोटी न देकर स्वर्ग में सुख देता है। 

अपने महापुरुष के नाम पर संघ के पास केवल सावरकर का नाम है। किन्तु यह दुःखद और अप्रिय संयोग है कि अंग्रेजों को पेश किया लिखित माफीनामा और खुद को अंग्रेजों का निष्ठावान सहयोगी घोषित करने वाले पत्र इतिहास के पन्ने बने हुए हैं। इसलिए सावरकर भी बहुत थोड़ी दूर तक संघ के लिए उपयोगी साबित हो पाते हैं।

संघ के इतिहास में दीनदयाल उपाध्याय अब तक के इकलौते ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने आर्थिक चिन्तन किया। किन्तु उनका ‘अन्त्योदय’ भी अन्ततः गाँधी के ‘अन्तिम आदमी की चिन्ता’ के विचार की नकल कह दिया जाता है।

ये कुछ छोटे-छोटे उदाहरण हैं जिनसे संघ का संकट समझा जा सकता है। गाँधी पहले ही क्षण से संघ के गले की फाँस बना हुआ है। वह न निगलते बनता है न उगलते। गाँधी की सर्वकालीनता और वैश्विकता सारी दुनिया मानती है। स्थिति यह है कि गाँधी भारत से अधिक शेष दुनिया में जाने-माने-पूजे जाते हैं। संघ की उलझन इसी से समझी जा सकती है कि वह गाँधी को जहाँ ‘प्रातः स्मरणीय’ कहता है वहीं गाँधी-हत्या को ‘गाँधी-वध’  कहता है। 

इस देश में गाँधी के बिना किसी का काम नहीं चल पाता। गाँधी सर्वप्रिय, सर्वस्वीकार और सर्व-सुलभ हैं। उनसे खुद को जोड़कर हर कोई अपना कद बढ़ा सकता है। बाजार की भाषा में कहें तो गाँधी ‘बेस्ट सेलेब्रिटी’ हैं। इसकी सबसे ज्यादा बिक्री और सर्वाधिक लाभ-अर्जन काँग्रेस ने किया और कुछ इस तरह किया कि वह इसे अपनी जागीर समझने लगी जबकि गाँधी तो सबके हैं।

इसीलिए, मोदी यदि खुद को गाँधी से जोड़ने से नहीं रोक सके तो यह सहज स्वाभाविक है। इस उपक्रम पर नाराज होनेवाले भूल जाते हैं कि किसी से भी जुड़ने पर गाँधी का कद कम नहीं होता। गाँधी यदि होते तो वे भी नाराज नहीं होते। हाँ! बड़ा अन्तर यह रहा कि काँग्रेसियों ने कभी खुद को गाँधी की तरह पेश नहीं किया जबकि अपने इस विवादित उपक्रम में मोदी खुद को गाँधी साबित करते हुए गाँधी से आगे जाते हुए लगते हैं। 

मेरे विचार से मोदी गुस्से के नहीं, सहानुभूति के पात्र हैं। पता नहीं किन क्षणों में उन्हें (या उन्हें इस स्थिति में प्रस्तुत करनेवाले को) यह विचार आया और उनकी दशा, गाँवों-कस्बों के मेले में, लम्बे बाँसों पर चढ़कर चलनेवाले विज्ञापनी-व्यक्ति जैसी हो गई जिसकी असामान्य ऊँचाई को ताज्जुब से देखते तो सब हैं किन्तु जानते हैं कि यह उसकी नहीं, बाँसों की ऊँचाई है। हमारा जनमानस बोलता भले न हो किन्तु जानता खूब है कि फूलों के साथ धागा और कीट-पतंग भी देवताओं के कण्ठ तक पहुँच जाते हैं। धागा तो दिखाई नहीं देता। कीट-पतंग दिखाई देते हैं। तकलीफ की बात यह है कि उन्हें देखते समय लोगों को उनकी उपयोगिता याद नहीं आती। याद आता है, उनका काटना और उससे उपजी खुजलाहट।

मेरा तो मत है कि मोदी पर गुस्सा होनेवालों और गाँधी प्रेमियों ने गाँधी की आत्मा की प्रसन्नता के लिए मोदी से सार्वजनिक क्षमा याचना कर लेनी चाहिए। 
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(दैनिक सुबह सवेरे, भोपाल में 18 जनवरी 2017 को प्रकाशित)